श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 82: ययातिसे देवयानीको पुत्र-प्राप्ति; ययाति और शर्मिष्ठाका एकान्त मिलन और उनसे एक पुत्रका जन्म  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.82.17 
पृष्टं तु साक्ष्ये प्रवदन्तमन्यथा
वदन्ति मिथ्या पतितं नरेन्द्र।
एकार्थतायां तु समाहितायां
मिथ्या वदन्तं त्वनृतं हिनस्ति॥ १७॥
 
 
अनुवाद
महाराज! यदि कोई निर्दोष मनुष्य के प्राण बचाने के लिए गवाही देने वाले को बुलाकर अन्यथा (झूठ) बोले, तो उसका कथन मिथ्या है। किन्तु जहाँ अपने और दूसरों के प्राण बचाने की स्थिति उत्पन्न हो, वहाँ केवल अपने प्राण बचाने के लिए झूठ बोलने वाले मनुष्य का मिथ्या कथन उसका नाश कर देता है॥ 17॥
 
Maharaj! If someone calls a person who testifies to save the life of an innocent person and speaks otherwise (falsely) then his statement is false. But where the situation arises to save the life of both oneself and others, the false statement of the person who lies only to save his own life, leads to his destruction.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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