श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 82: ययातिसे देवयानीको पुत्र-प्राप्ति; ययाति और शर्मिष्ठाका एकान्त मिलन और उनसे एक पुत्रका जन्म  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  1.82.12-13 
शर्मिष्ठोवाच
सोमस्येन्द्रस्य विष्णोर्वा यमस्य वरुणस्य च।
तव वा नाहुष गृहे क: स्त्रियं द्रष्टुमर्हति॥ १२॥
रूपाभिजनशीलैर्हि त्वं राजन् वेत्थ मां सदा।
सा त्वां याचे प्रसाद्याहमृतुं देहि नराधिप॥ १३॥
 
 
अनुवाद
शर्मिष्ठा बोली - नहुषनंदन! चन्द्रमा, इन्द्र, विष्णु, यम, वरुण या आपके महल में कौन किसी स्त्री पर दृष्टि डाल सकता है? (अतः मैं यहाँ पूर्णतः सुरक्षित हूँ) महाराज! आप मेरे रूप, वंश और चरित्र को सदैव से जानते हैं। आज मैं प्रार्थना करती हूँ कि आप प्रसन्न होकर मुझे रजोदर्शन का वरदान दें - मेरे रजोदर्शन को सफल करें॥ 12-13॥
 
Sharmishtha said - Nahushanandan! Chandrama, Indra, Vishnu, Yama, Varuna or who in your palace can cast eyes on a woman? (Therefore I am completely safe here) Maharaj! You have always known about my beauty, lineage and character. Today I pray to please you and grant me the boon of my periods - make my periods successful.॥ 12-13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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