श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 81: सखियोंसहित देवयानी और शर्मिष्ठाका वन-विहार, राजा ययातिका आगमन, देवयानीकी उनके साथ बातचीत तथा विवाह  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  1.81.33 
शुक्र उवाच
अधर्मात् त्वां विमुञ्चामि वृणु त्वं वरमीप्सितम्।
अस्मिन् विवाहे मा म्लासीरहं पापं नुदामि ते॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
शुक्राचार्य बोले - राजन! मैं तुम्हें पाप मुक्त करता हूँ; जो चाहो वर मांग लो। इस विवाह को लेकर तुम्हारे मन में कोई पश्चाताप नहीं होना चाहिए। मैं तुम्हारे सारे पाप दूर करता हूँ।
 
Shukracharya said - King! I free you from sin; ask for any boon you wish. You should not have any remorse in your mind about this marriage. I remove all your sins.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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