श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 80: शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको संतुष्ट करना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  1.80.21 
वैशम्पायन उवाच
तत: कन्यासहस्रेण वृता शिबिकया तदा।
पितुर्नियोगात् त्वरिता निश्चक्राम पुरोत्तमात्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तत्पश्चात् पिता की आज्ञा पाकर राजकुमारी शर्मिष्ठा तुरन्त ही रथ पर सवार होकर राजधानी से बाहर निकल पड़ी। उस समय वह एक हजार कन्याओं से घिरी हुई थी।
 
Vaishampayana says - Janamejaya! Thereafter, by her father's order, Princess Sharmishtha immediately boarded a chariot and left the capital. At that time, she was surrounded by a thousand girls.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)