Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.76.63: ‘जब मैं विद्याहीन था, तब मेरे पूज्य गुरुजनों ने मेरे दोनों कानों में मृतसंजीवनी रूपी ज्ञान-अमृत डाला था। इसी प्रकार जो भी अन्य ज्ञानी महात्मा मेरे कानों में ज्ञान-अमृत डालेंगे, उन्हें भी मैं अपने माता-पिता के समान मानूँगा (जैसे मैं गुरुदेव शुक्राचार्य को मानता हूँ)। गुरुदेव के किए हुए उपकारों का स्मरण करते हुए शिष्य को उचित है कि वह उनके साथ कभी विश्वासघात न करे॥ 63॥ | mahabharat अध्याय 1.76: कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त करना । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
य: श्रोत्रयोरमृतं संनिषिञ्चेद्
विद्यामविद्यस्य यथा ममायम्।
तं मन्येऽहं पितरं मातरं च
तस्मै न द्रुह्येत् कृतमस्य जानन्॥ ६३॥
अनुवाद
‘जब मैं विद्याहीन था, तब मेरे पूज्य गुरुजनों ने मेरे दोनों कानों में मृतसंजीवनी रूपी ज्ञान-अमृत डाला था। इसी प्रकार जो भी अन्य ज्ञानी महात्मा मेरे कानों में ज्ञान-अमृत डालेंगे, उन्हें भी मैं अपने माता-पिता के समान मानूँगा (जैसे मैं गुरुदेव शुक्राचार्य को मानता हूँ)। गुरुदेव के किए हुए उपकारों का स्मरण करते हुए शिष्य को उचित है कि वह उनके साथ कभी विश्वासघात न करे॥ 63॥
‘When I was devoid of knowledge, my respected teachers poured the nectar of knowledge in the form of Mrit Sanjivani in both my ears. Similarly, whoever other wise Mahatmas will pour the nectar of knowledge in my ears, I will also consider them as my parents (like I consider Gurudev Shukracharya). Remembering the favors done by Gurudev, it is appropriate for the disciple to never betray him.॥ 63॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥