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mahabharat 1.76.45: "पिताजी! ऐसा लगता है कि वह मारा गया है या मर गया है। मैं आपसे सच कहता हूँ, मैं उसके बिना नहीं रह सकता।"॥45॥   |   mahabharat अध्याय 1.76: कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 76: कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त करना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  1.76.45 
व्यक्तं हतो मृतो वापि कचस्तात भविष्यति।
तं विना न च जीवेयं कचं सत्यं ब्रवीमि ते॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
"पिताजी! ऐसा लगता है कि वह मारा गया है या मर गया है। मैं आपसे सच कहता हूँ, मैं उसके बिना नहीं रह सकता।"॥45॥
 
"Father! It seems he has been killed or has died. I tell you the truth, I cannot live without him."॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)