समाहूय मुनीन् कण्व: कारुण्यादिदमब्रवीत्॥
मया तु लालिता नित्यं मम पुत्री यशस्विनी।
वने जाता विवृद्धा च न च जानाति किञ्चन॥
अश्रमेण पथा सर्वैर्नीयतां क्षत्रियालयम्।)
अनुवाद
महर्षि कण्व ने उन ऋषियों को बुलाकर करुणापूर्वक कहा—‘महर्षियों! मेरी यह तेजस्वी पुत्री वन में उत्पन्न हुई है और यहीं पली-बढ़ी है। मैंने इसका सदैव लाड़-प्यार किया है। यह कुछ भी नहीं जानती। हे ब्राह्मणो! तुम सब इसे राजा दुष्यंत के घर ऐसे मार्ग से ले चलो, जिसमें अधिक श्रम न करना पड़े।’
Maharishi Kanva called those sages and said with compassion—‘Maharishis! This glorious daughter of mine was born in the forest and has grown up here. I have always pampered her. She does not know anything. Brahmins! All of you take her to King Dushyant’s house through a route that does not require much effort’.