श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक  »  श्लोक d34
 
 
श्लोक  1.74.d34 
(वैशम्पायन उवाच
धर्माभिपूजितं पुत्रं काश्यपेन निशाम्य तु।
काश्यपात् प्राप्य चानुज्ञां मुमुदे च शकुन्तला॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! यह देखकर कि कश्यपपुत्र कण्व ने धर्मानुसार मेरे पुत्र का बहुत आदर किया है और उनसे पति के घर जाने की अनुमति प्राप्त करके शकुन्तला मन ही मन बहुत प्रसन्न हुई।
 
Vaishampayana says - Janamejaya! Seeing that Kanva, son of Kashyapa, has respected my son very much according to Dharma, and receiving his permission to go to her husband's house, Shakuntala was very happy in her heart.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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