श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक  »  श्लोक 96
 
 
श्लोक  1.74.96 
सत्यधर्मच्युतात् पुंस: क्रुद्धादाशीविषादिव।
अनास्तिकोऽप्युद्विजते जन: किं पुनरास्तिक:॥ ९६॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य सत्यधर्म से भ्रष्ट हो गया है, वह क्रोध में आए हुए विषधर सर्प के समान भयंकर है। नास्तिक भी उससे डरता है; फिर आस्तिक के विषय में क्या कहा जा सकता है? ॥96॥
 
The person who is corrupt from the true religion is as dangerous as a poisonous snake in anger. Even an atheist fears him; then what can be said about a believer? ॥96॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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