श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  1.74.84 
क्षितावटसि राजेन्द्र अन्तरिक्षे चराम्यहम्।
आवयोरन्तरं पश्य मेरुसर्षपयोरिव॥ ८४॥
 
 
अनुवाद
राजेन्द्र! तुम तो केवल पृथ्वी पर ही विचरण करते हो, परन्तु मैं आकाश में भी विचरण कर सकता हूँ। ध्यान से देखो, तुममें और मुझमें उतना ही अन्तर है जितना सुमेरु पर्वत और सरसों में। 84।
 
Rajendra! You move only on the earth, but I can move in the sky as well. Look carefully, there is a difference between you and me like that between Mount Sumeru and mustard seeds. 84.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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