श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक  »  श्लोक 66-67
 
 
श्लोक  1.74.66-67 
यथा ह्याहवनीयोऽग्निर्गार्हपत्यात् प्रणीयते।
तथा त्वत्त: प्रसूतोऽयं त्वमेक: सन् द्विधा कृत:॥ ६६॥
मृगावकृष्टेन पुरा मृगयां परिधावता।
अहमासादिता राजन् कुमारी पितुराश्रमे॥ ६७॥
 
 
अनुवाद
'जैसे गार्हपत्य अग्नि से आहवनीय अग्नि उत्पन्न होती है, उसी प्रकार यह बालक आपसे उत्पन्न हुआ है, मानो आप एक ही हैं, किन्तु अब दो रूपों में प्रकट हुए हैं। हे राजन! कुछ वर्ष पूर्व आप शिकार खेलने वन में गए थे। वहाँ एक जंगली पशु के प्रति आकर्षित होकर आप मेरे पिता के आश्रम में भाग गए, जहाँ आपने मुझ कुमारी कन्या को गंधर्व विवाह द्वारा अपनी पत्नी के रूप में प्राप्त किया।
 
‘Just as the Aahavaniya fire is created from the Garhapatya fire, similarly this child has been born from you, as if you are one but have now appeared in two forms. O King! A few years ago you went to the forest to hunt. There you were attracted by a wild animal and you ran to my father's hermitage, where you obtained me, a virgin girl, as your wife through Gandharva marriage.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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