श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  1.74.63 
अङ्गादङ्गात् सम्भवसि हृदयादधिजायसे।
आत्मा वै पुत्रनामासि स जीव शरद: शतम्॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
(उस मंत्र का अर्थ इस प्रकार है -) हे बालक! तुम मेरे शरीर के प्रत्येक अंग से प्रकट हुए हो; मेरे हृदय से उत्पन्न हुए हो। तुम मेरी आत्मा हो, मेरे पुत्र कहलाते हो। अतः हे मेरे बालक! तुम सौ वर्ष तक जीवित रहो।
 
(The meaning of that mantra is as follows -) O child! You have appeared from each and every part of my body; you have been born from my heart. You are my soul, known as my son. Therefore, my child! May you live for a hundred years.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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