श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  1.74.58 
स्पृशतु त्वां समाश्लिष्य पुत्रोऽयं प्रियदर्शन:।
पुत्रस्पर्शात् सुखतर: स्पर्शो लोके न विद्यते॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
'तुम्हारा पुत्र देखने में कितना सुन्दर है । वह तुम्हारे शरीर से लिपटकर तुम्हें स्पर्श करे । पुत्र के स्पर्श से बढ़कर सुखदायक संसार में कोई दूसरा स्पर्श नहीं है ॥58॥
 
‘Your son is so lovely to look at. He should cling to your body and touch you. There is no other touch in the world more soothing than the touch of a son. ॥ 58॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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