श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  1.74.48 
आत्माऽऽत्मनैव जनित: पुत्र इत्युच्यते बुधै:।
तस्माद् भार्यां नर: पश्येन्मातृवत् पुत्रमातरम्॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
विद्वान पुरुष अपनी पत्नी के गर्भ से उत्पन्न आत्मा को पुत्र कहता है। अतः पुरुष को चाहिए कि पुत्र की माता बनी हुई अपनी पत्नी को अपनी माता के समान समझे ॥48॥
 
'The learned man calls the soul born from his wife's womb as his son. Therefore, a man should look upon his wife, who has become the mother of a son, as his own mother. ॥ 48॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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