श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  1.74.32 
न तु तुष्यति यस्यैष पुरुषस्य दुरात्मन:।
तं यम: पापकर्माणं वियातयति दुष्कृतम्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
'परन्तु जिस दुष्टात्मा से अन्तर्यामी संतुष्ट नहीं होते, उस पापी को उसके पापों का दण्ड स्वयं यमराज देते हैं ॥32॥
 
'But the evil soul with whom the Antaryami is not satisfied, Yamaraja himself punishes that sinner for his sins. ॥ 32॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas