श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  1.74.27 
योऽन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते।
किं तेन न कृतं पापं चौरेणात्मापहारिणा॥ २७॥
 
 
अनुवाद
(तुम्हारा वास्तविक स्वरूप तो कुछ और ही है, परन्तु तुम कुछ और ही होने का दिखावा कर रहे हो।) जो अपना वास्तविक स्वरूप छिपाकर अपने को कुछ और ही दिखाता है, उस चोर ने, जो उसकी आत्मा का अपहरण करता है, कौन-सा पाप नहीं किया है? ॥27॥
 
(Your true nature is something else but you are pretending to be something else.) He who hides his true nature and shows himself to be something else, what sin has that thief who kidnaps his soul not committed? ॥27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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