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श्लोक 1.74.132-133  |
भरतस्यान्ववाये हि देवकल्पा महौजस:।
बभूवुर्ब्रह्मकल्पाश्च बहवो राजसत्तमा:॥ १३२॥
येषामपरिमेयानि नामधेयानि सर्वश:।
तेषां तु ते यथामुख्यं कीर्तयिष्यामि भारत।
महाभागान् देवकल्पान् सत्यार्जवपरायणान्॥ १३३॥ |
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| अनुवाद |
| भरत के कुल में देवताओं के समान पराक्रमी और ब्रह्माजी के समान तेजस्वी बहुत से ऋषि हुए हैं; जिनके पूर्ण नामों की गणना करना असम्भव है। जनमेजय! उनमें जो प्रमुख हैं, उनके नाम मैं तुमसे कहता हूँ। वे सभी महाभाग राजा देवताओं के समान तेजस्वी और सत्य, सरलता आदि सिद्धांतों में तत्पर थे ॥132-133॥ |
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| In Bharat's clan, there have been many sages as mighty as the gods and as brilliant as Brahmaji; Whose complete names are impossible to enumerate. Janamejaya! I will describe to you the names of those who are important among them. All those Mahabhag kings were as bright as the gods and were devoted to the principles of truth, simplicity etc. 132-133॥ |
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इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शकुन्तलोपाख्याने चतु:सप्ततितमोऽध्याय:॥ ७४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें शकुन्तलोपाख्यानविषयक चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७४॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ८९ १/२ श्लोक मिलाकर कुल २२२ १/२ श्लोक हैं) |
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