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mahabharat 1.64.44: हे भारत! जगत् के रचयिता को देवताओं और दानवों सहित सम्पूर्ण जगत् के सम्पूर्ण विचार क्यों नहीं समझ आते?॥44॥   |   mahabharat अध्याय 1.64: ब्राह्मणोंद्वारा क्षत्रियवंशकी उत्पत्ति और वृद्धि तथा उस समयके धार्मिक राज्यका वर्णन; असुरोंका जन्म और उनके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना तथा ब्रह्माजीका देवताओंको अपने अंशसे पृथ्वीपर जन्म लेनेका आदेश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 64: ब्राह्मणोंद्वारा क्षत्रियवंशकी उत्पत्ति और वृद्धि तथा उस समयके धार्मिक राज्यका वर्णन; असुरोंका जन्म और उनके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना तथा ब्रह्माजीका देवताओंको अपने अंशसे पृथ्वीपर जन्म लेनेका आदेश  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  1.64.44 
स्रष्टा हि जगत: कस्मान्न सम्बुध्येत भारत।
ससुरासुरलोकानामशेषेण मनोगतम्॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
हे भारत! जगत् के रचयिता को देवताओं और दानवों सहित सम्पूर्ण जगत् के सम्पूर्ण विचार क्यों नहीं समझ आते?॥44॥
 
O Bharata! Why should the creator of the world not understand the complete thoughts of the whole world including the gods and demons? ॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)