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mahabharat 1.64.4-5: पूर्वकाल में जमदग्नि के पुत्र परशुराम ने पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियविहीन कर दिया था और महान पर्वत महेंद्र पर तपस्या की थी। उस समय जब भृगु के पुत्र ने इस संसार को क्षत्रियविहीन कर दिया था, तब क्षत्रिय स्त्रियाँ पुत्र प्राप्ति की इच्छा से ब्राह्मणों की शरण में गई थीं।   |   mahabharat अध्याय 1.64: ब्राह्मणोंद्वारा क्षत्रियवंशकी उत्पत्ति और वृद्धि तथा उस समयके धार्मिक राज्यका वर्णन; असुरोंका जन्म और उनके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना तथा ब्रह्माजीका देवताओंको अपने अंशसे पृथ्वीपर जन्म लेनेका आदेश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 64: ब्राह्मणोंद्वारा क्षत्रियवंशकी उत्पत्ति और वृद्धि तथा उस समयके धार्मिक राज्यका वर्णन; असुरोंका जन्म और उनके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना तथा ब्रह्माजीका देवताओंको अपने अंशसे पृथ्वीपर जन्म लेनेका आदेश  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  1.64.4-5 
त्रि:सप्तकृत्व: पृथिवीं कृत्वा नि:क्षत्रियां पुरा।
जामदग्न्यस्तपस्तेपे महेन्द्रे पर्वतोत्तमे॥ ४॥
तदा नि:क्षत्रिये लोके भार्गवेण कृते सति।
ब्राह्मणान् क्षत्रिया राजन् सुतार्थिन्योऽभिचक्रमु:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
पूर्वकाल में जमदग्नि के पुत्र परशुराम ने पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियविहीन कर दिया था और महान पर्वत महेंद्र पर तपस्या की थी। उस समय जब भृगु के पुत्र ने इस संसार को क्षत्रियविहीन कर दिया था, तब क्षत्रिय स्त्रियाँ पुत्र प्राप्ति की इच्छा से ब्राह्मणों की शरण में गई थीं।
 
In the past, Jamadagni's son Parashurama had made the earth free of Kshatriyas twenty-one times and had performed penance on the great mountain Mahendra. At that time, when Bhrigu's son had made this world free of Kshatriyas, the Kshatriya women had sought refuge with the Brahmins in the desire of having a son. 4-5.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)