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mahabharat 1.64.18: हे भारतश्रेष्ठ! ऐसी व्यवस्था होने पर समुद्रपर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वी दीर्घायु मनुष्यों से भर गई ॥18॥   |   mahabharat अध्याय 1.64: ब्राह्मणोंद्वारा क्षत्रियवंशकी उत्पत्ति और वृद्धि तथा उस समयके धार्मिक राज्यका वर्णन; असुरोंका जन्म और उनके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना तथा ब्रह्माजीका देवताओंको अपने अंशसे पृथ्वीपर जन्म लेनेका आदेश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 64: ब्राह्मणोंद्वारा क्षत्रियवंशकी उत्पत्ति और वृद्धि तथा उस समयके धार्मिक राज्यका वर्णन; असुरोंका जन्म और उनके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना तथा ब्रह्माजीका देवताओंको अपने अंशसे पृथ्वीपर जन्म लेनेका आदेश  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.64.18 
एवमायुष्मतीभिस्तु प्रजाभिर्भरतर्षभ।
इयं सागरपर्यन्ता समापूर्यत मेदिनी॥ १८॥
 
 
अनुवाद
हे भारतश्रेष्ठ! ऐसी व्यवस्था होने पर समुद्रपर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वी दीर्घायु मनुष्यों से भर गई ॥18॥
 
Bharatshrestha! With such an arrangement in place, the entire earth right up to the ocean was filled with long-lived people. 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)