श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 63: राजा उपरिचरका चरित्र तथा सत्यवती, व्यासादि प्रमुख पात्रोंकी संक्षिप्त जन्मकथा  »  श्लोक d4-d6h
 
 
श्लोक  1.63.d4-d6h 
सत्यवत्युवाच
(शक्ते: पुत्रो महाप्राज्ञ: पराशर इति स्मृत:॥
नावं वाहयमानाया मम दृष्ट्वा सुगर्हितम्।
अपास्य मत्स्यगन्धत्वं योजनाद् गन्धतां ददौ॥
ऋषे: प्रसादं दृष्ट्वा तु जना: प्रीतिमुपागमन्।)
 
 
अनुवाद
सत्यवती बोली - पिताश्री! महर्षि शक्ति के पुत्र विद्वान पराशर हैं, (वे उस समय यमुना तट पर आये हुए थे) मैं नाव चला रही थी। उन्होंने मेरी दुर्गन्ध देखकर मुझ पर दया की और मेरे शरीर से मछली की दुर्गन्ध दूर करके मुझे ऐसी सुगन्ध दी जिसका प्रभाव एक योजन की दूरी तक है। महर्षि की यह कृपा देखकर सभी लोग बहुत प्रसन्न हुए।
 
Satyavati said - Father! Maharishi Shakti's son is a learned person Parashar, (he had come to the banks of Yamuna at that time) I was rowing the boat. He looked at my foul smell and showed mercy on me and removed the smell of fish from my body and gave me such a fragrance which has its effect up to a distance of one yojana. Seeing this kindness of Maharishi, everyone was very happy.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)