श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 63: राजा उपरिचरका चरित्र तथा सत्यवती, व्यासादि प्रमुख पात्रोंकी संक्षिप्त जन्मकथा  »  श्लोक 43-45
 
 
श्लोक  1.63.43-45 
अशोकैश्चम्पकैश्चूतैरनेकैरतिमुक्तकै: ।
पुन्नागै: कर्णिकारैश्च वकुलैर्दिव्यपाटलै:॥ ४३॥
पाटलैर्नारिकेलैश्च चन्दनैश्चार्जुनैस्तथा।
एतै रम्यैर्महावृक्षै: पुण्यै: स्वादुफलैर्युतम्॥ ४४॥
कोकिलाकुलसंनादं मत्तभ्रमरनादितम्।
वसन्तकाले तत् तस्य वनं चैत्ररथोपमम्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
राजा का वन देवताओं के चैत्ररथ वन के समान सुन्दर था। वसन्त ऋतु थी; अशोक, चम्पा, आम, अतिमुक्तक (माधविलत), पुन्नाग (नागकेसर), कनेर, मौलसिरी, दिव्यपाटल, पाताल, नारियल, चंदन और अर्जुन - ये सुन्दर एवं पवित्र वृक्ष स्वादिष्ट फलों से युक्त उस वन की शोभा बढ़ा रहे थे। कोयलों ​​की चहचहाहट से सारा वन गूँज रहा था। चारों ओर मतवाले भौंरे कलरव कर रहे थे।
 
The king's forest was as beautiful as the Chaitrarath forest of the gods. It was the spring season; Ashoka, Champa, Mango, Atimuktaka (Madhavilata), Punnaag (Nagkesar), Kaner, Maulsiri, Divya Patal, Patal, Coconut, Sandalwood and Arjun - these beautiful and sacred trees bearing delicious fruits were enhancing the beauty of that forest. The entire forest was resonating with the chirping of the cuckoos. Drunk bumblebees were making a chirping sound all around.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)