श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 58: यज्ञकी समाप्ति एवं आस्तीकका सर्पोंसे वर प्राप्त करना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  1.58.8 
समाप्यतामिदं कर्म पन्नगा: सन्त्वनामया:।
प्रीयतामयमास्तीक: सत्यं सूतवचोऽस्तु तत्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
'यह यज्ञ पूर्ण हो। नागगण सुरक्षित रहें और ये आस्तिकगण प्रसन्न हों। सूतजी ने जो कहा है, वह भी सत्य हो।'॥8॥
 
'Let this yajna ceremony be completed. May the serpents remain safe and may these astikas be happy. May what Sutji has said also come true.'॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)