श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 58: यज्ञकी समाप्ति एवं आस्तीकका सर्पोंसे वर प्राप्त करना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  1.58.32 
श्रुत्वा धर्मिष्ठमाख्यानमास्तीकं पुण्यवर्धनम्।
यन्मां त्वं पृष्टवान् ब्रह्मञ्छ्रुत्वा डुण्डुभभाषितम्।
व्येतु ते सुमहद् ब्रह्मन् कौतूहलमरिन्दम॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
आस्तिक की यह धार्मिक कथा तुम्हारे पुण्यों को बढ़ाने वाली है। हे काम, क्रोध आदि शत्रुओं का दमन करने वाले ब्राह्मण! दुन्दुभ की बात सुनकर तुमने मुझसे जो कथा पूछी थी, वह मैंने तुम्हें सुनाई है। इसे सुनकर अब तुम्हारे मन की महान जिज्ञासा शांत हो जानी चाहिए। ॥32॥
 
This religious tale of Aastik increases your virtues. O Brahmin, who has suppressed the enemies of lust, anger, etc.! I have narrated to you the tale about which you had asked me after listening to Dundubha's talk. After listening to this, the great curiosity of your mind should now be satiated. ॥ 32॥
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पसत्रे अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें सर्पसत्रविषयक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५८॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)