श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 58: यज्ञकी समाप्ति एवं आस्तीकका सर्पोंसे वर प्राप्त करना  »  श्लोक 30-31
 
 
श्लोक  1.58.30-31 
यथा कथितवान् ब्रह्मन् प्रमति: पूर्वजस्तव।
पुत्राय रुरवे प्रीत: पृच्छते भार्गवोत्तम॥ ३०॥
यद् वाक्यं श्रुतवांश्चाहं तथा च कथितं मया।
आस्तीकस्य कवेर्विप्र श्रीमच्चरितमादित:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्मन्! भृगुवंशशिरोमणे! जिस प्रकार आपके पूर्वज प्रमति ने अपने पुत्र रुरु के पूछने पर आस्तिक कथा कही थी और जिसे मैंने भी सुना था, उसी प्रकार मैंने विद्वान महात्मा आस्तिक के शुभ चरित्र का प्रारम्भ से ही वर्णन किया है ॥30-31॥
 
Brahman! Bhriguvansh Shiromane! Just as your ancestor Pramatin had narrated the Aastik story when asked by his son Ruru and which I had also heard, in the same way I have described the auspicious character of the learned Mahatma Aastik from the very beginning. 30-31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)