श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 58: यज्ञकी समाप्ति एवं आस्तीकका सर्पोंसे वर प्राप्त करना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.58.3 
हूयमाने भृशं दीप्ते विधिवद् वसुरेतसि।
न स्म स प्रापतद् वह्नौ तक्षको भयपीडित:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
चूँकि अग्नि पूर्णतः प्रज्वलित थी और उसमें आहुति दी जा रही थी, अतः भय से पीड़ित तक्षक नाग अग्नि में नहीं गिरा॥3॥
 
Because the fire was fully lit and ritual sacrifices were being made in it, Takshak Naag, suffering from fear, did not fall into the fire. 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)