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mahabharat 1.58.25: हे महाविषैले सर्प! भाग जा! तेरा कल्याण हो! अब तू जा। जनमेजय के यज्ञ के अन्त में आस्तिक को दी गई अपनी प्रतिज्ञा को स्मरण कर॥ 25॥   |   mahabharat अध्याय 1.58: यज्ञकी समाप्ति एवं आस्तीकका सर्पोंसे वर प्राप्त करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 58: यज्ञकी समाप्ति एवं आस्तीकका सर्पोंसे वर प्राप्त करना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  1.58.25 
सर्पापसर्प भद्रं ते गच्छ सर्प महाविष।
जनमेजयस्य यज्ञान्ते आस्तीकवचनं स्मर॥ २५॥
 
 
अनुवाद
हे महाविषैले सर्प! भाग जा! तेरा कल्याण हो! अब तू जा। जनमेजय के यज्ञ के अन्त में आस्तिक को दी गई अपनी प्रतिज्ञा को स्मरण कर॥ 25॥
 
'You highly poisonous serpent! Run away! May you be blessed! Now you go. Remember the promise you made to Aastik at the end of Janamejaya's sacrifice.॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)