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mahabharat 1.58.24: (मंत्र और उसका अर्थ इस प्रकार है -) मैं आस्तिक नामक प्रसिद्ध ऋषि का स्मरण कर रहा हूँ, जो जरत्कारु नामक नागकन्या से उत्पन्न हुए थे और जिन्होंने सर्पजाल में आप सर्पों की रक्षा की थी। हे परम सौभाग्यशाली सर्पो! मुझे मत डसो।   |   mahabharat अध्याय 1.58: यज्ञकी समाप्ति एवं आस्तीकका सर्पोंसे वर प्राप्त करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 58: यज्ञकी समाप्ति एवं आस्तीकका सर्पोंसे वर प्राप्त करना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  1.58.24 
यो जरत्कारुणा जातो जरत्कारौ महायशा:।
आस्तीक: सर्पसत्रे व: पन्नगान् योऽभ्यरक्षत।
तं स्मरन्तं महाभागा न मां हिंसितुमर्हथ॥ २४॥
 
 
अनुवाद
(मंत्र और उसका अर्थ इस प्रकार है -) मैं आस्तिक नामक प्रसिद्ध ऋषि का स्मरण कर रहा हूँ, जो जरत्कारु नामक नागकन्या से उत्पन्न हुए थे और जिन्होंने सर्पजाल में आप सर्पों की रक्षा की थी। हे परम सौभाग्यशाली सर्पो! मुझे मत डसो।
 
(The mantra and its meaning are as follows -) I am remembering the famous sage named Aastik who was born from the serpent girl named Jaratkaru from the sage Jaratkaru and who protected you snakes in the snake trap. O very fortunate snakes! Do not bite me.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)