Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 1.58.15-16: आस्तिक उत्तम संस्कारों से युक्त और विद्वान पुरुष था। अपना कर्तव्य पूरा करके वह संतुष्ट और प्रसन्न था। राजा जनमेजय ने प्रसन्नतापूर्वक उसे उसके घर विदा किया और कहा, 'ब्राह्मण! मेरे आगामी अश्वमेध नामक महायज्ञ में भाग लेने की कृपा करो और उस समय पुनः पधारो।'॥15-16॥   |   mahabharat अध्याय 1.58: यज्ञकी समाप्ति एवं आस्तीकका सर्पोंसे वर प्राप्त करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 58: यज्ञकी समाप्ति एवं आस्तीकका सर्पोंसे वर प्राप्त करना  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  1.58.15-16 
आस्तीकं प्रेषयामास गृहानेव सुसंस्कृतम्।
राजा प्रीतमना: प्रीतं कृतकृत्यं मनीषिणम्॥ १५॥
पुनरागमनं कार्यमिति चैनं वचोऽब्रवीत् ।
भविष्यसि सदस्यो मे वाजिमेधे महाक्रतौ॥ १६॥
 
 
अनुवाद
आस्तिक उत्तम संस्कारों से युक्त और विद्वान पुरुष था। अपना कर्तव्य पूरा करके वह संतुष्ट और प्रसन्न था। राजा जनमेजय ने प्रसन्नतापूर्वक उसे उसके घर विदा किया और कहा, 'ब्राह्मण! मेरे आगामी अश्वमेध नामक महायज्ञ में भाग लेने की कृपा करो और उस समय पुनः पधारो।'॥15-16॥
 
Aastik was endowed with good values and was a learned man. He was satisfied and happy as he had completed his duty. King Janamejaya happily sent him off to his home and said, 'Brahmin! Please be a part of my upcoming great sacrifice called Ashwamedha and please come again at that time.'॥ 15-16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)