श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 54: माताकी आज्ञासे मामाको सान्त्वना देकर आस्तीकका सर्पयज्ञमें जाना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  1.54.30 
स प्राप्य यज्ञायतनं वरिष्ठं
द्विजोत्तम: पुण्यकृतां वरिष्ठ:।
तुष्टाव राजानमनन्तकीर्ति-
मृत्विक्सदस्यांश्च तथैव चाग्निम्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार उस उत्तम यज्ञ मण्डप के निकट पहुँचकर पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ विप्रवर अस्तिक ने यजमान राजा जनमेजय, ऋत्विजों, सभासदों तथा अनन्त यश से सुशोभित अग्निदेव की स्तुति आरम्भ की॥30॥
 
In this way, reaching near that most excellent Yagya Mandap, Vipravar Astikha, the best among the virtuous people, started praising the host King Janamejaya, the Ritvijas, the members and Agnidev, adorned with eternal fame. 30॥
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पसत्रे आस्तीकागमने चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें सर्पसत्रमें आस्तीकका आगमनविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५४॥

 
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