श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 54: माताकी आज्ञासे मामाको सान्त्वना देकर आस्तीकका सर्पयज्ञमें जाना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  1.54.22 
स सम्भावय नागेन्द्र मयि सर्वं महामते।
न ते मयि मनो जातु मिथ्या भवितुमर्हति॥ २२॥
 
 
अनुवाद
हे परम बुद्धिमान नागराज! मुझमें यह सब करने की क्षमता है, इस पर विश्वास रखो। मुझ पर तुम्हारी आशा और विश्वास कभी मिथ्या नहीं हो सकता।॥ 22॥
 
‘O very intelligent Nagaraj! I have the capability to do all this, please have faith in this. The hope and trust you have in me can never be false.’॥ 22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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