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श्लोक 1.54.2  |
अहं तव पितु: पुत्र भ्रात्रा दत्ता निमित्तत:।
काल: स चायं सम्प्राप्तस्तत् कुरुष्व यथातथम्॥ २॥ |
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| अनुवाद |
| ‘बेटा! मेरे भाई ने एक उद्देश्य से मेरा विवाह तुम्हारे पिता से किया था। उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए यह उचित अवसर है। अतः तुम्हें उस उद्देश्य की पूर्ति उचित रीति से करनी चाहिए।’॥2॥ |
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| ‘Son! My brother had married me to your father for a purpose. This is the right opportunity to fulfill that purpose. So you should fulfill that purpose in the proper manner.'॥ 2॥ |
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