श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 54: माताकी आज्ञासे मामाको सान्त्वना देकर आस्तीकका सर्पयज्ञमें जाना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.54.17 
सौतिरुवाच
एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा सास्तीको मातरं तदा।
अब्रवीद् दु:खसंतप्तं वासुकिं जीवयन्निव॥ १७॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाज कहते हैं - जब उनकी माता ने ऐसा कहा, तब आस्तिक ने उनसे कहा - ‘माता! आप जैसी आज्ञा देंगी, वैसा ही करूंगा।’ तत्पश्चात् वे इस प्रकार बोले मानो पीड़ित वासुकि को जीवनदान दे रहे हों -॥17॥
 
Ugrasravāja says - When his mother said this, Aastik told her - 'Mother! I will do as you command.' Thereafter, he spoke as if giving life to the suffering Vasuki -॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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