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mahabharat 1.54.14-16: हे देवतुल्य तेजस्वी पुत्र! ब्रह्माजी के ये वचन सुनकर सर्पों में श्रेष्ठ वासुकि ने मुझे तुम्हारे पिता की सेवा में समर्पित कर दिया। इस अवसर के आने से बहुत पहले ही इसी उद्देश्य से मेरा विवाह हुआ था। तत्पश्चात् उन महर्षि ने मेरे गर्भ से तुम्हारा जन्म लिया। जनमेजय के सर्पयज्ञ का पूर्वनिर्धारित समय आज उपस्थित है (उस यज्ञ में निरन्तर सर्प दग्ध हो रहे हैं), अतः भय के कारण तुम उन सबको बचा लो। मेरे भाई को भी उस भयंकर अग्नि से बचा लो। जिस उद्देश्य से मैं तुम्हारे बुद्धिमान पिता की सेवा में दिया गया हूँ, वह व्यर्थ न जाए। अथवा पुत्र! सर्पों को इस संकट से बचाने के लिए तुम क्या उचित समझते हो?॥14-16॥   |   mahabharat अध्याय 1.54: माताकी आज्ञासे मामाको सान्त्वना देकर आस्तीकका सर्पयज्ञमें जाना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 54: माताकी आज्ञासे मामाको सान्त्वना देकर आस्तीकका सर्पयज्ञमें जाना  »  श्लोक 14-16
 
 
श्लोक  1.54.14-16 
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं वासुकि: पन्नगोत्तम:।
प्रादान्माममरप्रख्य तव पित्रे महात्मने॥ १४॥
प्रागेवानागते काले तस्मात् त्वं मय्यजायथा:।
अयं स काल: सम्प्राप्तो भयान्नस्त्रातुमर्हसि॥ १५॥
भ्रातरं चापि मे तस्मात् त्रातुमर्हसि पावकात् ।
न मोघं तु कृतं तत् स्याद् यदहं तव धीमते।
पित्रे दत्ता विमोक्षार्थं कथं वा पुत्र मन्यसे॥ १६॥
 
 
अनुवाद
हे देवतुल्य तेजस्वी पुत्र! ब्रह्माजी के ये वचन सुनकर सर्पों में श्रेष्ठ वासुकि ने मुझे तुम्हारे पिता की सेवा में समर्पित कर दिया। इस अवसर के आने से बहुत पहले ही इसी उद्देश्य से मेरा विवाह हुआ था। तत्पश्चात् उन महर्षि ने मेरे गर्भ से तुम्हारा जन्म लिया। जनमेजय के सर्पयज्ञ का पूर्वनिर्धारित समय आज उपस्थित है (उस यज्ञ में निरन्तर सर्प दग्ध हो रहे हैं), अतः भय के कारण तुम उन सबको बचा लो। मेरे भाई को भी उस भयंकर अग्नि से बचा लो। जिस उद्देश्य से मैं तुम्हारे बुद्धिमान पिता की सेवा में दिया गया हूँ, वह व्यर्थ न जाए। अथवा पुत्र! सर्पों को इस संकट से बचाने के लिए तुम क्या उचित समझते हो?॥14-16॥
 
O son who is as radiant as a god! On hearing these words of Brahma, the best of the serpents, Vasuki, dedicated me to the service of your great father. Much before this opportunity came, I was married for this very purpose. Thereafter, you were born from my womb by that great sage. The pre-determined time of the snake sacrifice of Janamejaya is present today (serpents are being burnt continuously in that sacrifice), hence, out of fear, you should save all of them. Save my brother also from that dreadful fire. The purpose for which I was given to the service of your wise father should not go in vain. Or son! What do you think is appropriate to save the snakes from this danger?॥14-16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)