|
| |
| |
श्लोक 1.53.26  |
तद् वत्से ब्रूहि वत्सं स्वं कुमारं वृद्धसम्मतम्।
ममाद्य त्वं सभृत्यस्य मोक्षार्थं वेदवित्तमम्॥ २६॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| 'अतः वत्से! आज तुम वेद विद्वानों में श्रेष्ठ अपने पुत्र कुमार आस्तिक से कहो कि वह मेरे बन्धु-बान्धवों सहित मेरे प्राणों की संकट से रक्षा करे। बालक होने पर भी वह वृद्धों द्वारा भी आदर किया जाता है। 26॥ |
| |
| 'So Vatse! Today, tell your son Kumar Aastik, the best among Veda scholars, to save my life along with my relatives from trouble. Despite being a child, he is respected even by old men. 26॥ |
| |
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पसत्रे वासुकिवाक्ये त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें सर्पसत्रके विषयमें वासुकिवचनसम्बन्धी तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५३॥
|
| |
| ✨ ai-generated |
| |
|