श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 53: सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  1.53.25 
आस्तीक: किल यज्ञं तं वर्तन्तं भुजगोत्तमे।
प्रतिषेत्स्यति मां पूर्वं स्वयमाह पितामह:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
'महान् सर्प! पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने मुझसे स्वयं कहा था - 'आस्थावान पुरुष उस यज्ञ को रोक देगा'॥25॥
 
'Great serpent! In the past, Lord Brahma had personally told me - 'The believer will stop that Yagya'. 25॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas