श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 53: सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना  »  श्लोक 21-22
 
 
श्लोक  1.53.21-22 
दह्यन्त्यङ्गानि मे भद्रे न दिश: प्रतिभान्ति च।
सीदामीव च सम्मोहात् घूर्णतीव च मे मन:॥ २१॥
दृष्टिर्भ्राम्यति मेऽतीव हृदयं दीर्यतीव च।
पतिष्याम्यवशोऽद्याहं तस्मिन् दीप्ते विभावसौ॥ २२॥
 
 
अनुवाद
'भद्रे! मेरे अंग-प्रत्यंग जल रहे हैं। मुझे अपनी दिशा दिखाई नहीं दे रही। मैं दुर्बल होता जा रहा हूँ और मोह के कारण मेरा मन चकरा रहा है, मेरी आँखें घूम रही हैं, मेरा हृदय विदीर्ण हो रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि आज मैं भी असहाय होकर उस यज्ञ की धधकती अग्नि में गिर पड़ूँगा।
 
'Bhadra! My body parts are burning. I am unable to see my direction. I am becoming weak and my mind is spinning due to attachment, my eyes are spinning, my heart is getting torn. It seems that today I too will be helpless and fall into the blazing fire of that yajna.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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