श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 53: सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.53.18 
सौतिरुवाच
एवमाश्वासितस्तेन तत: स भुजगोत्तम:।
उवास भवने तस्मिञ्छक्रस्य मुदित: सुखी॥ १८॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - इन्द्र के इस प्रकार आश्वासन देने पर समस्त नागों में श्रेष्ठ तक्षक इन्द्र के महल में सुखपूर्वक रहने लगा॥18॥
 
Ugrasravaji says - After being assured by Indra in this manner, Takshak, the best amongst all the serpents, started living happily and contentedly in the Indra's palace.॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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