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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 51: जनमेजयके सर्पयज्ञका उपक्रम  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  1.51.7 
आहर्ता तस्य सत्रस्य त्वन्नान्योऽस्ति नराधिप।
इति पौराणिका: प्राहुरस्माकं चास्ति स क्रतु:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! पौराणिक विद्वान कहते हैं कि आपके अतिरिक्त उस यज्ञ को करने वाला कोई दूसरा नहीं है। हम उस यज्ञ के नियमों को जानते हैं।
 
O Lord of men! The Puranic scholars say that there is no one else except you who can perform that yajna. We know the rules of that yajna.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)