श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 51: जनमेजयके सर्पयज्ञका उपक्रम  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  1.51.14-15 
निमित्तं महदुत्पन्नं यज्ञविघ्नकरं तदा।
यज्ञस्यायतने तस्मिन् क्रियमाणे वचोऽब्रवीत्॥ १४॥
स्थपतिर्बुद्धिसम्पन्नो वास्तुविद्याविशारद:।
इत्यब्रवीत् सूत्रधार: सूत: पौराणिकस्तदा॥ १५॥
 
 
अनुवाद
उस यज्ञ में विघ्न उत्पन्न करने वाला एक बड़ा कारण उपस्थित हुआ। जब वह यज्ञ मण्डप बन रहा था, तब वास्तुशास्त्र के निपुण विद्वान, बुद्धिमान एवं अनुभवी वास्तुकार सूतजी वहाँ आये और बोले- ॥14-15॥
 
A big reason causing disruption in that Yagya appeared. When that Yagya Mandap was being built, Suta, an expert scholar of Vaastu Shastra, an intelligent and experienced architect, came there and said – ॥ 14-15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)