श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 50: शृंगी ऋषिका परीक्षित् को शाप, तक्षकका काश्यपको लौटाकर छलसे परीक्षित् को डँसना और पिताकी मृत्युका वृत्तान्त सुनकर जनमेजयकी तक्षकसे बदला लेनेकी प्रतिज्ञा  »  श्लोक 48-49
 
 
श्लोक  1.50.48-49 
जनमेजय उवाच
श्रुत्वैतद् भवतां वाक्यं पितुर्मे स्वर्गतिं प्रति।
निश्चितेयं मम मतिर्या च तां मे निबोधत।
अनन्तरं च मन्येऽहं तक्षकाय दुरात्मने॥ ४८॥
प्रतिकर्तव्यमित्येवं येन मे हिंसित: पिता।
शृङ्गिणं हेतुमात्रं य: कृत्वा दग्ध्वा च पार्थिवम्॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय ने कहा, "मंत्रियो! मेरे पिता के स्वर्ग जाने के विषय में आपके वचन सुनकर मैंने अपनी बुद्धि से जो कर्तव्य निश्चित किया है, उसे आप लोग सुनिए। मैं सोचता हूँ कि हमें उस दुष्ट बुद्धि तक्षक से तुरंत बदला लेना चाहिए, जिसने श्रृंगी ऋषि को मात्र बहाना बनाकर स्वयं मेरे पिता महाराज को अपनी विषभरी अग्नि से जलाकर मार डाला है।"
 
Janamejaya said, "Ministers! After hearing your words about my father's departure to heaven, please listen to the duty that I have decided with my wisdom. I think that we should immediately take revenge from that evil-minded Takshak, who, using Shringi Rishi as a mere pretext, has himself killed my father Maharaja by burning him with his poisonous fire. 48-49.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)