श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 50: शृंगी ऋषिका परीक्षित् को शाप, तक्षकका काश्यपको लौटाकर छलसे परीक्षित् को डँसना और पिताकी मृत्युका वृत्तान्त सुनकर जनमेजयकी तक्षकसे बदला लेनेकी प्रतिज्ञा  »  श्लोक 24-25
 
 
श्लोक  1.50.24-25 
ततस्तं लोभयामास कामं ब्रूहीति तक्षक:।
स एवमुक्तस्तं प्राह काश्यपस्तक्षकं पुन:॥ २४॥
धनलिप्सुरहं तत्र यामीत्युक्तश्च तेन स:।
तमुवाच महात्मानं तक्षक: श्लक्ष्णया गिरा॥ २५॥
 
 
अनुवाद
अब तक्षक ने कश्यप को प्रलोभन देना आरम्भ किया। उसने कहा- ‘तुम्हारी जो इच्छा हो, वह मुझसे मांग लो।’ तक्षक की यह बात सुनकर कश्यप ने उससे कहा- ‘मैं धन के लिए वहाँ जा रहा हूँ।’ तक्षक की यह बात सुनकर महात्मा कश्यप ने मधुर वाणी में कहा- ॥24-25॥
 
Now Takshak started tempting Kashyap. He said- 'Ask me for whatever you wish.' On hearing Takshak say this, Kashyap said to him- 'I am going there for money.' On hearing Takshak say this to Mahatma Kashyap in a sweet voice-॥24-25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)