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mahabharat 1.47.16-17: हे ब्रह्मन्! दिन ढलने वाला था। अतः वासुकी की बुद्धिमान बहन जरत्कारु अपने पति के धर्मभ्रष्ट होने से भयभीत होकर इस प्रकार सोचने लगी - 'इस समय अपने पति को जगाना मेरे लिए उचित होगा या नहीं? मेरे धर्मात्मा पति का स्वभाव बड़ा दुःखी है। मैं किस प्रकार आचरण करूँ, जिससे मैं उनकी दृष्टि में अपराधी न बन जाऊँ?' 16-17.   |   mahabharat अध्याय 1.47: जरत्कारु मुनिका नागकन्याके साथ विवाह, नागकन्या जरत्कारुद्वारा पतिसेवा तथा पतिका उसे त्यागकर तपस्याके लिये गमन   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 47: जरत्कारु मुनिका नागकन्याके साथ विवाह, नागकन्या जरत्कारुद्वारा पतिसेवा तथा पतिका उसे त्यागकर तपस्याके लिये गमन  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  1.47.16-17 
अ ह् न: परिक्षये ब्रह्मंस्तत: साचिन्तयत् तदा।
वासुकेर्भगिनी भीता धर्मलोपान्मनस्विनी॥ १६॥
किं नु मे सुकृतं भूयाद् भर्तुरुत्थापनं न वा।
दु:खशीलो हि धर्मात्मा कथं नास्यापराध्नुयाम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मन्! दिन ढलने वाला था। अतः वासुकी की बुद्धिमान बहन जरत्कारु अपने पति के धर्मभ्रष्ट होने से भयभीत होकर इस प्रकार सोचने लगी - 'इस समय अपने पति को जगाना मेरे लिए उचित होगा या नहीं? मेरे धर्मात्मा पति का स्वभाव बड़ा दुःखी है। मैं किस प्रकार आचरण करूँ, जिससे मैं उनकी दृष्टि में अपराधी न बन जाऊँ?' 16-17.
 
O Brahman! The day was about to end. Therefore, Vasuki's intelligent sister Jaratkaru, fearful of her husband's lapse of religion, began to think thus - 'Will it be good (in accordance with religion) for me to wake my husband at this time or not? My virtuous husband has a very sad nature. How should I behave, so that I do not become a criminal in his eyes? 16-17.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)