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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 47: जरत्कारु मुनिका नागकन्याके साथ विवाह, नागकन्या जरत्कारुद्वारा पतिसेवा तथा पतिका उसे त्यागकर तपस्याके लिये गमन  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  1.47.12 
ऋतुकाले तत: स्नाता कदाचिद् वासुके: स्वसा।
भर्तारं वै यथान्यायमुपतस्थे महामुनिम्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात, जब वासुकी की बहन का मासिक धर्म आया, तो स्नान करने के बाद, वह अपने पति, महान ऋषि जरात्कार की सेवा में उपस्थित हुई।
 
Thereafter, when her menstrual period arrived, Vasuki's sister, after taking a bath, presented herself in the service of her husband, the great sage Jaratkaar.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)