श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 46: जरत्कारुका शर्तके साथ विवाहके लिये उद्यत होना और नागराज वासुकिका जरत्कारु नामकी कन्याको लेकर आना  »  श्लोक 8-9
 
 
श्लोक  1.46.8-9 
सनाम्नीं यद्यहं कन्यामुपलप्स्ये कदाचन।
भविष्यति च या काचिद् भैक्ष्यवत् स्वयमुद्यता॥ ८॥
प्रतिग्रहीता तामस्मि न भरेयं च यामहम्।
एवंविधमहं कुर्यां निवेशं प्राप्नुयां यदि।
अन्यथा न करिष्येऽहं सत्यमेतत् पितामहा:॥ ९॥
 
 
अनुवाद
(परन्तु इसके लिए एक शर्त होगी-) ‘यदि मुझे कभी अपने नाम वाली कोई कुंवारी कन्या मिले, और उनमें भी ऐसी कन्या मिले जो बिना माँगे ही भिखारी की तरह विवाह के लिए प्रस्तुत हो जाए और जिसके पालन-पोषण का दायित्व मेरा न हो, तो मैं उससे विवाह कर लूँगा।’ यदि ऐसा विवाह मेरे लिए सहज हो जाए तो मैं कर लूँगा, अन्यथा विवाह ही नहीं करूँगा। दादाजी! यही मेरा सच्चा निश्चय है। 8-9।
 
(But there will be one condition for this-) 'If I ever find a virgin girl with the same name as mine, and among them also the one who will present herself for marriage without being asked like a beggar and whose upbringing will not be my responsibility, I will marry her.' If such a marriage becomes easy for me then I will do it, otherwise I will not marry at all. Grandfather! This is my true determination. 8-9.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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