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mahabharat 1.46.22-23: उसने सोचा, सम्भव है । इस कन्या का नाम मेरे नाम के समान न हो । इसके पालन-पोषण का भार कौन उठाएगा, यह अभी तक निश्चित नहीं हुआ है । यह सोचकर कि मैं इसे छोड़कर मोक्षपद में स्थित हूँ, उसने पत्नी लेने में शिथिलता दिखाई । हे भृगुपुत्र ! इसीलिए पहले तो उसने वासुकि से उस कन्या का नाम पूछा और फिर स्पष्ट कह दिया- 'मैं इसका पालन-पोषण नहीं करूँगा' ॥ 22-23॥   |   mahabharat अध्याय 1.46: जरत्कारुका शर्तके साथ विवाहके लिये उद्यत होना और नागराज वासुकिका जरत्कारु नामकी कन्याको लेकर आना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 46: जरत्कारुका शर्तके साथ विवाहके लिये उद्यत होना और नागराज वासुकिका जरत्कारु नामकी कन्याको लेकर आना  »  श्लोक 22-23
 
 
श्लोक  1.46.22-23 
असनामेति वै मत्वा भरणे चाविचारिते।
मोक्षभावे स्थितश्चापि मन्दीभूत: परिग्रहे॥ २२॥
ततो नाम स कन्याया: पप्रच्छ भृगुनन्दन।
वासुकिं भरणं चास्या न कुर्यामित्युवाच ह॥ २३॥
 
 
अनुवाद
उसने सोचा, सम्भव है । इस कन्या का नाम मेरे नाम के समान न हो । इसके पालन-पोषण का भार कौन उठाएगा, यह अभी तक निश्चित नहीं हुआ है । यह सोचकर कि मैं इसे छोड़कर मोक्षपद में स्थित हूँ, उसने पत्नी लेने में शिथिलता दिखाई । हे भृगुपुत्र ! इसीलिए पहले तो उसने वासुकि से उस कन्या का नाम पूछा और फिर स्पष्ट कह दिया- 'मैं इसका पालन-पोषण नहीं करूँगा' ॥ 22-23॥
 
He thought, it is possible. This girl may not have the same name as mine. Who will bear the responsibility of her maintenance, this has not been decided yet. Thinking that apart from her I am situated in the state of Moksha, he showed laxity in taking a wife. O son of Bhrigu! That is why first he asked Vasuki the name of that girl and then clearly said- 'I will not maintain her'॥ 22-23॥
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि वासुकिजरत्कारुसमागमे षट्चत्वा रिंशोऽध्याय:॥ ४६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें वासुकि-जरत्कारु-समागमसम्बन्धी

छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४६॥
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)