श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 46: जरत्कारुका शर्तके साथ विवाहके लिये उद्यत होना और नागराज वासुकिका जरत्कारु नामकी कन्याको लेकर आना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  1.46.1 
सौतिरुवाच
एतच्छ्रुत्वा जरत्कारुर्भृशं शोकपरायण:।
उवाच तान् पितॄन् दु:खाद् वाष्पसंदिग्धया गिरा॥ १॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - शौनकजी! यह सुनकर जरत्कारु अत्यन्त दुःखी हो गया और दुःख के आँसू बहाता हुआ रुँधे हुए स्वर में अपने पितरों से बोला॥1॥
 
Ugrasravaji says - Shaunakji! On hearing this, Jaratkaru became deeply saddened and spoke to his forefathers in choked voice while shedding tears of sorrow.॥ 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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