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mahabharat 1.42.4: तथापि, पिता को उचित है कि वह अपने पुत्र को बड़ा होने पर भी सदैव अच्छे कर्म करने की सलाह दे; जिससे वह गुणवान बने और महान यश प्राप्त करे ॥4॥   |   mahabharat अध्याय 1.42: शमीकका अपने पुत्रको समझाना और गौरमुखको राजा परीक्षित् के पास भेजना, राजाद्वारा आत्मरक्षाकी व्यवस्था तथा तक्षक नाग और काश्यपकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 42: शमीकका अपने पुत्रको समझाना और गौरमुखको राजा परीक्षित् के पास भेजना, राजाद्वारा आत्मरक्षाकी व्यवस्था तथा तक्षक नाग और काश्यपकी बातचीत  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.42.4 
पित्रा पुत्रो वय:स्थोऽपि सततं वाच्य एव तु।
यथा स्याद् गुणसंयुक्त: प्राप्नुयाच्च महद् यश:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
तथापि, पिता को उचित है कि वह अपने पुत्र को बड़ा होने पर भी सदैव अच्छे कर्म करने की सलाह दे; जिससे वह गुणवान बने और महान यश प्राप्त करे ॥4॥
 
However, it is appropriate for the father to always advise his son to do good deeds even after he grows up; So that he becomes virtuous and achieves great fame. 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)