श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 41: शृंगी ऋषिका राजा परीक्षित् को शाप देना और शमीकका अपने पुत्रको शान्त करते हुए शापको अनुचित बताना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  1.41.32 
तेनेह क्षुधितेनाद्य श्रान्तेन च तपस्विना।
अजानता कृतं मन्ये व्रतमेतदिदं मम॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
वह तपस्वी राजा भूखा-प्यासा और थका-माँदा यहाँ आया था। उसे मेरे मौन व्रत का ज्ञान नहीं था, इसलिए उसने मेरे मौन रहने पर क्रोधित होकर यह कृत्य किया ॥32॥
 
That ascetic king came here hungry and thirsty and tired. He was unaware of my vow of silence, so he got angry at my silence and did this. ॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)