vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 1: आदि पर्व
»
अध्याय 41: शृंगी ऋषिका राजा परीक्षित् को शाप देना और शमीकका अपने पुत्रको शान्त करते हुए शापको अनुचित बताना
»
श्लोक 32
श्लोक
1.41.32
तेनेह क्षुधितेनाद्य श्रान्तेन च तपस्विना।
अजानता कृतं मन्ये व्रतमेतदिदं मम॥ ३२॥
अनुवाद
वह तपस्वी राजा भूखा-प्यासा और थका-माँदा यहाँ आया था। उसे मेरे मौन व्रत का ज्ञान नहीं था, इसलिए उसने मेरे मौन रहने पर क्रोधित होकर यह कृत्य किया ॥32॥
That ascetic king came here hungry and thirsty and tired. He was unaware of my vow of silence, so he got angry at my silence and did this. ॥ 32॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×