श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 41: शृंगी ऋषिका राजा परीक्षित् को शाप देना और शमीकका अपने पुत्रको शान्त करते हुए शापको अनुचित बताना  »  श्लोक 30-31
 
 
श्लोक  1.41.30-31 
देवाद् वृष्टि: प्रवर्तेत वृष्टेरोषधय: स्मृता:।
ओषधिभ्यो मनुष्याणां धारयन् सततं हितम्॥ ३०॥
मनुष्याणां च यो धाता राजा राज्यकर: पुन:।
दशश्रोत्रियसमो राजा इत्येवं मनुरब्रवीत्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
भगवान् की प्रसन्नता से ही वर्षा होती है, वर्षा से अन्न उत्पन्न होता है और जो राजा अन्न के द्वारा मनुष्यों का कल्याण निरन्तर करके राज्य का पालन करता है, वही मनुष्यों का पालनकर्ता (पालक) है। मनुजी ने कहा है कि राजा दस श्रोत्रिय के समान होता है ॥30-31॥
 
Due to the pleasure of God, rain occurs, food is produced from rain, and the king who maintains the kingdom by continuously nourishing the welfare of human beings through food is the provider (sustainer) for humans. Manuji has said that the king is like ten Shrotriyas. 30-31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)